आजकल जब भी मैं सोशल मीडिया खोलती हूँ, मन में एक अनजाना भय घर करने लगता है। कहीं किसी मासूम बच्ची के साथ अत्याचार की खबर सामने आती है, तो कहीं किसी युवा की आत्महत्या की सूचना मन को विचलित कर देती है। मानो हर दिन कोई नई पीड़ा, बेचैनी और भय-संबंधी खबरें हमारे मन-मस्तिष्क को झकझोरने के लिए उपस्थित हो जाती हैं। कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता है कि जनमानस की संवेदनाएँ धीरे-धीरे क्षीण होती जा रही हैं।
मनुष्य के भीतर निहित करुणा - जिसे समाज की सबसे बड़ी शक्ति माना जाता है — वही गुण हमें सृष्टि के अन्य प्राणियों से विशिष्ट बनाता है। किंतु आज ऐसा अनुभव होता है कि मानवीय गुण जैसे करुणा, स्नेह, प्रेम और संवेदना भीड़ और दिखावे के शोर में दबते चले जा रहे हैं। समाचार अब केवल “सूचनाएँ” बनकर रह गई हैं, जिन पर लोग कुछ क्षण दुख व्यक्त करते हैं, थोड़ी-सी हमदर्दी प्रकट करते हैं, और फिर तुरंत अपनी दिनचर्या या स्वार्थ की ओर लौट जाते हैं। परंतु किसी व्यक्ति के जीवन की वह त्रासदी किसी परिवार के लिए असहनीय पीड़ा होती है — जिसे यह मतलबी समाज बहुत शीघ्र भुला देता है।
कभी-कभी मन के भीतर यह प्रश्न उदित होता है: क्या हम वास्तव में एक सभ्य समाज में रह रहे हैं? देखने में हम सभी मनुष्य अवश्य लगते हैं, पर आज हमारे विचारों और कर्मों में कहीं न कहीं बर्बरता की झलक दिखाई देने लगी है।
मानवता का यह विचलन केवल तकनीकी विकास या आधुनिकता का परिणाम नहीं है; यह हमारे भीतर की संवेदनात्मक क्षमताओं के मंद पड़ने का संकेत है। आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य पुनः अपनी “मनुष्यता” को सक्रिय चेतनावस्था में स्थापित करे, ताकि समाज केवल विकसित ही नहीं, बल्कि संवेदनशील और सुरक्षित भी बन सके।
मेरे विचार से यह समय आत्मचिंतन का है - और इस धरती पर रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अब गंभीर आत्ममंथन की अत्यंत आवश्यकता अनुभव होती है।