वह खेत खलियान, रंगमय माहौल और चिड़ियों की चहचहाहट मानों प्रकृति को कोई अपनी मुट्ठी में समेटे हुए हैं। लोग हो या फिर कोई और जीव ही क्यू न हो, उनका व्यक्तिव इतना सरल है कि कहना ही क्या? मेरा मन भी इन बहती अमृतरुपी झरनों में बसा हुआ है। जिसे याद करते ही मेरी आँखें सावन भादो जैसे बरसने लगती है।
बात रहन-सहन की हो या फिर व्यक्तित्व और आचरण की, देहात के निपुण लोग जिनके पास अच्छी शिक्षा उपलब्ध नहीं है वे बड़े अफसर बाबुओं से अच्छी नैतिकता रखते हैं। मानवता हो या मार्मिकता उनकी सोच काफी हद तक हम शहरी लोगों से अच्छी है। बात यहाँ शहर या गाँव की नहीं है, चंद गाँव ही पूरे देश का आदर्श प्रस्तुत करते है। इसी कारण मेरा मन शहरी होते हुए भी गाँवों के उन झोपडियों में बसा हुआ है। उसी झोपडी में बसा है, जहाँ त्रेतायुग में श्री राम जी ने वनवास काटा, उसी झोपड़ी में जहाँ श्री कृष्ण के परममित्र सुदामा रहते थे। उसी झोपडी में जहाँ आज भी अन्नदाता भूखे पेट सोते है।